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Makkari Shayari

Saraafat ke naqaab ke peeche chhupi makkari kabhi na kabhi saamne aa hi jaati hai.

Makkari shayari mein bhrashtachar, chori aur beimaani ko saraafat ke naqaab mein chhupe sarkari karmchari se juda batakar teekhi tanz ki gayi hai. Isi tanz mein Karmchari shayari bhi padhein.

भ्रष्टाचार है, चोरी है, बेईमानी, मक्कारी है,
शराफत का नकाब लगाकर बैठा सरकारी कर्मचारी है.

Bhrashtaachaar hai, choree hai, beeemaanee, makkaaree hai,
Sharaaphat ka nakaab lagaakar baitha sarakaaree karmachaaree hai.

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हमें पसंद नहीं जंग में भी मक्कारी,
जिसे निशाने पे रक्खें बता के रखते हैं...!

Hamen pasand nahin jang mein bhee makkaaree,
Jise nishaane pe rakkhen bata ke rakhate hain...!

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Frequently Asked Questions

मक्कारी शायरी में सरकारी कर्मचारी वाला शेर किस बात पर व्यंग्य करता है?
यह शेर उन लोगों पर तीखा व्यंग्य करता है जो शराफत का दिखावा करके असल में भ्रष्टाचार और बेईमानी करते हैं। पंक्ति है, "भ्रष्टाचार है, चोरी है, बेईमानी, मक्कारी है, शराफत का नकाब लगाकर बैठा सरकारी कर्मचारी है।" यह Naqaab यानी झूठे चेहरे के पीछे छिपी सच्चाई को उजागर करता है, और यह हर Karmchari पर लागू नहीं, बल्कि उन पर है जो अपने पद का गलत इस्तेमाल करते हैं।
जंग में मक्कारी न पसंद करने वाला शेर किस जज्बे को दिखाता है?
यह शेर ईमानदारी और साहस की बात करता है, जहाँ दुश्मन से भी सामने से लड़ने की बात कही गई है, छल-कपट से नहीं। पंक्ति है, "हमें पसंद नहीं जंग में भी मक्कारी, जिसे निशाने पे रक्खें बता के रखते हैं...!" यह जज़्बा Desh Bhakti से जुड़ी शायरी में भी वीरता और सच्चाई के मूल्यों के रूप में झलकता है।
क्या मक्कारी शायरी सिर्फ भ्रष्टाचार के दायरे तक सीमित है?
नहीं, यह विषय भ्रष्ट व्यवस्था से लेकर व्यक्तिगत ईमानदारी तक, धोखे और छल के हर रूप को छूता है। चाहे वह सरकारी दफ्तर में मक्कारी हो या जंग के मैदान में, Ham यानी हर आम इंसान इस बेईमानी का असर कहीं न कहीं महसूस करता है।

Doosra sher saaf kehta hai ki jung mein bhi makkari pasand nahi, jise nishana banana hota hai use bata kar hi rakha jaata hai. Aage Ham aur Hindi shayari bhi padhein.