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Mukammal Shayari

Adhoore jazbaat, poori shayari

Kisi shehar mein apna ghar na milna ho ya kisi rishte ka baar-baar imtihaan lena, yeh mukammal shayari zindagi ki adhoori chahaton ko seedhe dil se kehti hai. Isi tarah ke aur jazbaat Dil mein bhi milenge.

Mukammal Shayari – Adhoore Se Poore Hone Tak

कहीं मुकम्मल जमीन नहीं मिलती,
कहीं आसमान नहीं मिलता,
दिल के शहर दिल्ली में हर किसी को
अपना मकान नहीं मिलता.

Kaheen mukammal jameen nahin milatee,
Kaheen aasamaan nahin milata,
Dil ke shahar dillee mein har kisee ko
Apana makaan nahin milata.

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सब होगा मुकम्मल कबूल बनेंगे लाख जरिये
हुजूर एक दफा मोहब्बत तो करिये।

Sab Hoga Mukammal Kabool Banenge Laakh Jariye
Hujoor Ek Dafaa Mohabbat To Kariye.

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भरोसा करो तो मुकम्मल...
वफ़ा रोज़ रोज़ मत आज़माओ...!!

Bharosa karo to mukammal...
Vafa roz roz mat aazamao...!!

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जागने से मिल जाती गर मोहब्बत वापिस किसी को,
तू हर सुबह जाने कितनों का इश्क़ मुकम्मल हो जाता..

Jaagane se mil jaatee gar mohabbat vaapis kisee ko,
Too har subah jaane kitanon ka ishq mukammal ho jaata..

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2 Line Shayari

मुकम्मल है इबादत और मैं वतन ईमान रखता हूँ

मुकम्मल है इबादत और मैं वतन ईमान रखता हूँ,
वतन के शान की खातिर हथेली पे जान रखता हूँ !!
क्यु पढ़ते हो मेरी आँखों में नक्शा पाकिस्तान का ,
मुस्लमान हूँ मैं सच्चा, दिल में हिंदुस्तान रखता हूँ !!

Mukammal hai ibaadat aur main vatan eemaan rakhata hoon,
Watan ke shaan kee khaatir hathelee pe jaan rakhata hoon !!
Kyu padhate ho meree aankhon mein naksha paakistaan ka ,
Muslamaan hoon main sachcha, dil mein hindustaan rakhata hoon !!

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तुझमें हमेशा खुदा का अक्स देखा है मैंने,
मेरा इश्क़ तो कब का मुकम्मल हो गया।

Tujhamen hamesha khuda ka aks dekha hai mainne,
Mera ishq to kab ka mukammal ho gaya.

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धागा ही समझ,तू अपनी मन्नत का मुझे.
तेरी दुआओ के मुकम्मल होने का दस्तूर हूँ मैं..

Dhaaga hee samajh,too apanee mannat ka mujhe.
Teree duao ke mukammal hone ka dastoor hoon main..

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नाउम्मीद हो कर इश्क़ करो,
क्या पता मुक़म्मल हो जाये!

Naummeed ho kar ishq karo,
Kya pata muqammal ho jaaye!

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घर की इस बार मैं..मुकम्मल तलाशी लूँगी,
देखूं, ग़म छुपा कर..मेरे माँ बाप कहाँ रखते हैं।

Ghar kee is baar main..mukammal talaashee loongee,
Dekhoon, gam chhupa kar..mere maan baap kahaan rakhate hain.

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Aankh Shayari

खुश्मिजाज़ी फितरत हैं हमारी...
पर "दर्द" से मुकम्मल हैं हम...!!

Khushmijaazee phitarat hain hamaaree...
Par "dard" se mukammal hain ham...!!

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रोज रोज गिरकर भी मुकम्मल खड़ी हूँ...
ऐ मुश्किलो देखो मै तुमसे कितना बड़ी हूँ...!!

Roj roj girakar bhee mukammal khadee hoon...
Ai mushkilo dekho mai tumase kitana badee hoon...!!

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सिलसिला नींद का हर बार बिखर जाता है...
वो कोई ख्वाब मुकम्मल नहीं होने देता...!!

Silasila neend ka har baar bikhar jaata hai...
Vo koee khvaab mukammal nahin hone deta...!!

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या तो हमें मुकम्मल चालाकियाँ सिखाई जाए...
नहीं तो मासूमों की अलग बस्तियाँ बसाई जाए...

Ya to hamen mukammal chaalaakiyaan sikhaee jae...
Nahin to maasoomon kee alag bastiyaan basaee jae...

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मोहब्बत और नफरत दोनों मिल चुके हैं मुझे,
अब... मै तकरीबन मुकम्मल हो चुका हूँ !

Mohabbat aur napharat donon mil chuke hain mujhe,
Ab... mai takareeban mukammal ho chuka hoon !

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Frequently Asked Questions

"मुकम्मल शायरी" किस भाव को दर्शाती है?
मुकम्मल का अर्थ है पूर्ण या संपूर्ण, और यह शायरी अक्सर उस अधूरेपन की बात करती है जो हर किसी की ज़िंदगी में कहीं न कहीं रह जाता है। जैसे एक शेर में लिखा है, "कहीं मुकम्मल जमीन नहीं मिलती, कहीं आसमान नहीं मिलता, दिल के शहर दिल्ली में हर किसी को अपना मकान नहीं मिलता।" यह पंक्तियाँ बड़े शहर में हर Ham के अधूरे सपनों की झलक देती हैं।
क्या मुकम्मल शायरी में मोहब्बत को पूर्णता का जरिया बताया गया है?
हाँ, कई शेर मोहब्बत को ही जिंदगी की असली मुकम्मलता मानते हैं। एक पंक्ति कहती है, "सब होगा मुकम्मल कबूल बनेंगे लाख जरिये, हुजूर एक दफा मोहब्बत तो करिये।" यहाँ शायर का मानना है कि सच्ची मोहब्बत मिलते ही बाकी सब कुछ अपने आप पूरा हो जाता है, ठीक वैसे ही जैसे Dil से जुड़ी शायरी में मोहब्बत को हर चीज़ की जड़ बताया जाता है।
वफ़ा और भरोसे पर लिखी मुकम्मल शायरी का क्या संदेश है?
यह शायरी बताती है कि भरोसा जब हो तो वह मुकम्मल होना चाहिए, बार-बार परखा गया रिश्ता कमजोर पड़ जाता है। जैसा एक शेर में कहा गया है, "भरोसा करो तो मुकम्मल... वफ़ा रोज़ रोज़ मत आज़माओ...!!" यह पंक्ति रिश्तों में भरोसे की गहराई को सीधी और सच्ची भाषा में सामने रखती है।
क्या मुकम्मल शायरी छोटी, दो पंक्तियों वाली भी होती है?
जी हाँ, कई मुकम्मल शेर बेहद छोटे होते हुए भी गहरी बात कह जाते हैं, जैसे यह पंक्ति सिर्फ चार शब्दों में मोहब्बत की ताकत बयां कर देती है। ऐसी संक्षिप्त और असरदार रचनाएं 2 Line शायरी की श्रेणी में भी खूब पसंद की जाती हैं।
"इश्क़ मुकम्मल होना" किस तरह की भावना को बयां करता है?
इसका मतलब है प्रेम का पूरी तरह से सफल और संतुष्ट हो जाना, जो अक्सर सपनों और उम्मीदों से जुड़ा होता है। एक शेर में लिखा है, "जागने से मिल जाती गर मोहब्बत वापिस किसी को, तू हर सुबह जाने कितनों का इश्क़ मुकम्मल हो जाता..." यह पंक्ति उस चाहत को दर्शाती है जो कभी-कभी सिर्फ ख्वाब में ही मुकम्मल हो पाती है, जैसे Ibaadat शायरी में भी अधूरी चाहतों को इबादत जैसा समर्पण दिया जाता है।

Kai baar ek khamoshi ya ek nazar hi rishte ko poora kar deti hai, aur yeh sher usi baat ko chhote andaaz mein samjhate hain. Aankh aur 2 Line mein bhi aise hi lines dekhein.