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Neta Shayari

Neta ke vaade bade, par kisan ka dard wahi ka wahi.

Neta shayari mein tarakki ke daavon ke beech gareebo ka dard jyon ka tyon reh jaane ka zikr hai, aur kisan ke kachche makan ki deewar girne ka dard bhi. Isi mudde par Bharosa shayari bhi padhein.

Neta Shayari - Kisan Aur Awaam Ke Dard Ke Sher

आप भी सुनिए नेता जी क्या-क्या कह रहे हैं,
दौरे तरक्की में भी दर्द गरीब ही सह रहे हैं !!

Aap bhi suniye neta jee kya-kya kah rahe hain,
Daure tarakkee mein bhee dard gareeb hee sah rahe hain !!

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दीवार क्या गिरी किसान के कच्चे मकान की,
नेताओ ने उसके आँगन में रस्ता बन दिया.

Deevaar kya giree kisaan ke kachche makaan kee,
Netao ne usake aangan mein rasta ban diya.

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किसान की समस्या खत्म नही होती,
नेताओ के पास पैकेज अस्सी हैं,
अंत में समस्या खत्म करने के लिए,
किसान चुनता रस्सी हैं.

Kisaan kee samasya khatm nahee hotee,
Netao ke paas paikej assee hain,
Ant mein samasya khatm karane ke lie,
Kisaan chunata rassee hain.

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Frequently Asked Questions

'नेता जी क्या कह रहे हैं' वाली शायरी में क्या व्यंग्य है?
"आप भी सुनिए नेता जी क्या-क्या कह रहे हैं, दौरे तरक्की में भी दर्द गरीब ही सह रहे हैं" पंक्तियों में विकास के दौरों और भाषणों के बावजूद गरीबों की तकलीफ कम न होने पर व्यंग्य किया गया है — यह नेताओं के वादों और ज़मीनी हकीकत के फर्क पर आम टिप्पणी है, किसी खास नेता या पार्टी पर नहीं।
किसान के घर वाली शायरी में नेताओं पर क्या आरोप लगाया गया है?
"दीवार क्या गिरी किसान के कच्चे मकान की, नेताओ ने उसके आँगन में रस्ता बन दिया" पंक्तियों में एक गरीब किसान की मजबूरी का फायदा उठाकर उसकी ज़मीन पर रास्ता बना देने की बात है — यह आम आदमी की परेशानी के प्रति नेताओं की असंवेदनशीलता पर एक सामान्य सामाजिक टिप्पणी है।
किसान की समस्या और रस्सी वाली शायरी कितनी गंभीर है?
यह शायरी बेहद गंभीर विषय पर है — "किसान की समस्या खत्म नही होती, नेताओ के पास पैकेज अस्सी हैं, अंत में समस्या खत्म करने के लिए, किसान चुनता रस्सी हैं" पंक्तियाँ किसानों की गहरी पीड़ा और सरकारी योजनाओं के नाकाफी होने पर एक दर्द भरी टिप्पणी करती हैं। यह भाव Dard-bhari शायरी जैसे संवेदनशील विषयों से मेल खाता है।
क्या यह 'नेता' शायरी संग्रह किसी खास पार्टी के खिलाफ है?
नहीं, इस संग्रह की सभी शायरियाँ नेताओं और भ्रष्टाचार पर सामान्य सामाजिक टिप्पणी करती हैं, बिना किसी खास पार्टी या व्यक्ति का नाम लिए। जनता के Bharosa और नेताओं के वादों के बीच के फासले पर यह एक आम और व्यापक नज़रिया पेश करता है।

Ek sher yahan kisan ki samasya kabhi khatam na hone aur akhir mein rassi chunne tak ki majboori bayan karta hai. Aage Akele aur Dard-bhari shayari bhi padhein.