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Khudgarz Shayari

Kabhi apni khudgarzi bhi kabool karni padti hai.

Khudgarz shayari mein khudgarzi ke sabab bigadte rishton ki baat hoti hai, saath hi khuddari bhi apne saath rakhne ka jazba dikhta hai. Isi jazbe mein Apne shayari bhi padhein.

गरजा बहुत कि खुदगर्ज़ हुआ है
एक रिश्ता लाइलाज मर्ज़ हुआ है

Garaja bahut ki khudagarz hua hai
Ek rishta lailaaj marz hua hai

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मैं खुदगर्ज़ सही, ख़ुद्दारी भी अपने साथ रखती हूँ;
ख़ैरात में इश्क़ मिले भी तो, मुझे ज़रूरी नहीं लगता!

Main khudagarz sahee, khuddaaree bhee apane saath rakhatee hoon;
Khairaat mein ishq mile bhee to, mujhe zarooree nahin lagata!

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बे-अदबी नीम की नहीं , की वो कड़वी है....!
खुदगर्जी तो जीभ की , जिसे मीठा पसंद है...!

Be-adabee neem kee nahin , kee vo kadavee hai....!
Khudagarjee to jeebh kee , jise meetha pasand hai...!

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हमारी दोस्ती के बीच खुदगर्ज़ी भी शामिल है
ये बेमौसम का फल है ये बहुत मीठा नहीं होगा

Hamaaree dostee ke beech khudagarzee bhee shaamil hai
Ye bemausam ka phal hai ye bahut meetha nahin hoga

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2 Line Shayari

बे-अदबी नीम की नहीं, कि वो कड़वा है,
खुदगर्ज़ी तो जीभ की है जिसे मीठा पसंद है !!

Be-adabee neem kee nahin, ki vo kadava hai,
Khudagarzee to jeebh kee hai jise meetha pasand hai !!

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Frequently Asked Questions

खुदगर्ज़ी की शायरी में रिश्तों पर क्या टिप्पणी की गई है?
एक शेर में कहा गया है, "गरजा बहुत कि खुदगर्ज़ हुआ है, एक रिश्ता लाइलाज मर्ज़ हुआ है।" यहाँ खुदगर्ज़ी को एक ऐसी बीमारी की तरह दिखाया गया है जो रिश्ते को अंदर से खोखला कर देती है, कोई इलाज न मिलने जैसी हालत बना देती है।
क्या खुदगर्ज़ होना हमेशा बुरी बात मानी गई है?
नहीं, एक शायरी में इसे आत्म-सम्मान से जोड़ा गया है - "मैं खुदगर्ज़ सही, ख़ुद्दारी भी अपने साथ रखती हूँ; ख़ैरात में इश्क़ मिले भी तो, मुझे ज़रूरी नहीं लगता!" यानी खुद के लिए सोचना और बिना स्वाभिमान गंवाए जीना भी एक तरह की खुदगर्ज़ी मानी गई है, जो Khud से जुड़े भावों में देखने को मिलती है।
'नीम की बेअदबी नहीं' वाली शायरी का क्या मतलब है?
शेर कहता है, "बे-अदबी नीम की नहीं, की वो कड़वी है....! खुदगर्जी तो जीभ की, जिसे मीठा पसंद है...!" यहाँ नीम की कड़वाहट को दोष नहीं दिया गया, बल्कि जीभ की उस आदत को खुदगर्ज़ बताया गया है जो हमेशा मीठे की ही चाहत रखती है - यानी असली खुदगर्ज़ी अक्सर हमारे अपने स्वभाव में छिपी होती है।
दोस्ती में खुदगर्ज़ी को लेकर शायरी क्या कहती है?
एक शेर में सच्चाई मानी गई है - "हमारी दोस्ती के बीच खुदगर्ज़ी भी शामिल है, ये बेमौसम का फल है ये बहुत मीठा नहीं होगा।" यह Dost के रिश्ते में भी थोड़ी स्वार्थपरता के होने को ईमानदारी से स्वीकार करता है, बिना दिखावटी आदर्शवाद के।
खुदगर्ज़ी पर लिखी छोटी शायरियाँ कहाँ मिलेंगी?
"गरजा बहुत कि खुदगर्ज़ हुआ है, एक रिश्ता लाइलाज मर्ज़ हुआ है" जैसी संक्षिप्त पंक्तियाँ कम शब्दों में गहरी बात कहती हैं। ऐसी और 2 Line रचनाएं इसी अंदाज़ में उपलब्ध हैं।

Ek sher yahan yeh bhi kehta hai ki dosti mein bhi thodi khudgarzi shaamil ho sakti hai, jaise bemausam ka phal jyada meetha nahi hota. Aage Dost aur Ham shayari bhi padhein.