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Maula Shayari

Ek pukaar, seedhe Maula ke naam.

Maula shayari un sufi andaaz ki lines ka sangrah hai jo seedhe Maula se dua maangti hain, kabhi kismat sudharne ki, kabhi kisi pyaase ko paani banne ki niyat ki. Isi bhaav mein Jism shayari bhi padhein.

Maula Shayari - Sufi Andaaz Mein Ibadat Ke Sher

कभी उलझ पड़े मौला से...कभी साकी से हंगामा..
न नमाज़ अता हो सकी..न शराब पी सके..

Kabhee ulajh pade maula se...kabhee saakee se hangaama..
Na namaaz ata ho sakee..na sharaab pee sake..

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बड़ी दरारें है माथे पर मेरे मौला....
ज़रा मरम्मत मुकद्दर की कर दे....

Badee daraaren hai maathe par mere maula....
Zara marammat mukaddar kee kar de....

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एक कतरा ही सही मौला लेकिन ऐसी नियत दे की,
किसी प्यासे को देखु तो पानी बन जाऊ ।।

Ek katara hee sahee maula lekin aisee niyat de kee,
Kisee pyaase ko dekhu to paanee ban jaoo ..

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कभी खुद से मिला मेरे मौला

कभी “खुद” से मिला मेरे मौला
थक गया हूं गैरों से मिलते मिलते

Kabhee “khud” se mila mere maula
Thak gaya hoon gairon se milate milate

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2 Line Shayari

मेरे मौला मेरे मालिक मुक़द्दर एक नया लिख दे

मेरे मौला, मेरे मालिक मुक़द्दर एक नया लिख दे,
कि मेरे जिस्म और रूह में पुराना कुछ वहाँ ना हो...

Mere maula, mere maalik muqaddar ek naya likh de,
Ki mere jism aur rooh mein puraana kuchh vahaan na ho...

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एक क़तरा ही सहीं,मुझे ऐसी नीयत दे मौला...
किसी को प्यासा जो देखूँ,तो ख़ुदपानी हों जाऊ...!!

Ek qatara hee saheen,mujhe aisee neeyat de maula...
Kisee ko pyaasa jo dekhoon,to khudapaanee hon jaoo...!!

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Frequently Asked Questions

मौला शायरी में साक़ी का जिक्र किस भाव में आता है?
एक शेर में लिखा है 'कभी उलझ पड़े मौला से...कभी साकी से हंगामा.. न नमाज़ अता हो सकी..न शराब पी सके।' यहाँ साक़ी सूफ़ी और गज़ल परंपरा का जाना-पहचाना प्रतीक है जो ईश्वर की तलाश में इंसान की बेचैनी और आध्यात्मिक उलझन को दर्शाता है, न कि किसी सांसारिक चीज़ का जिक्र।
मौला से किस्मत सुधारने की गुज़ारिश वाली शायरी कौन सी है?
शायरी में लिखा है 'बड़ी दरारें है माथे पर मेरे मौला, ज़रा मरम्मत मुकद्दर की कर दे।' यह ईश्वर से सीधी, विनम्र प्रार्थना है कि वह टूटी हुई किस्मत को फिर से संवार दे।
मौला शायरी में दूसरों की मदद करने की चाहत कैसे बयां हुई है?
एक शायरी में लिखा है 'एक कतरा ही सही मौला लेकिन ऐसी नियत दे की, किसी प्यासे को देखु तो पानी बन जाऊ।' यह ईश्वर से यह दुआ मांगती है कि इंसान को इतनी सेवा-भावना मिले कि वह जरूरतमंद के लिए राहत का जरिया बन सके।
मौला में खुद से मिलने का जिक्र क्यों है?
शायरी कहती है 'कभी खुद से मिला मेरे मौला, थक गया हूं गैरों से मिलते मिलते।' यह गैर शायरी जैसे भाव में आध्यात्मिक तलाश की उस गहरी थकान को दिखाती है जहाँ इंसान बाहरी दुनिया में भटकने के बाद ईश्वर से खुद के भीतर मिलने की चाहत रखता है।
मौला शायरी किस परंपरा से प्रेरित है?
यह शायरी सूफ़ी और गज़ल की सम्मानित भक्ति-परंपरा से प्रेरित है, जिसमें मौला को सीधे संबोधित करके प्रेम, शिकायत और समर्पण के भाव व्यक्त किए जाते हैं। इसमें कतरा शायरी जैसे प्रतीकों के जरिए गहरी आध्यात्मिक भावनाएं व्यक्त होती हैं।

Kuch sher yahan khud se milne aur gairon se thak jaane ki baat bhi karte hain, imaandar aur vinamra andaaz mein. Aage Gair aur Kad shayari bhi padhein.