Maachis Shayari
Bina maachis ke hi logon ko jalate hain hum.
Maachis shayari mein ek chulbula andaaz hai ki chalo phir se haule se muskuraate hain, bina maachis ke hi logon ko jalate hain. Isi andaaz mein Aag shayari bhi padhein.
चलो फ़िर से हौले से मुस्कुराते हैं,
बिना माचिस के ही लोगों को जलाते हैं।
Chalo fir se haule se muskuraate hain,
Bina maachis ke hee logon ko jalaate hain.
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Frequently Asked Questions
'बिना माचिस के जलाना' वाली शायरी का क्या मतलब है?
शेर कहता है, "चलो फ़िर से हौले से मुस्कुराते हैं, बिना माचिस के ही लोगों को जलाते हैं।" यहाँ माचिस का ज़िक्र लाक्षणिक अर्थ में है - किसी को असल में आग से नहीं, बल्कि अपनी मुस्कुराहट और अंदाज़ से जलन पैदा करने की बात कही गई है, एक हल्के-फुल्के तंज़ भरे मूड में।
यह शायरी किस अंदाज़ की मानी जाती है - गुस्से की या शरारत की?
यह शरारत भरे, आत्मविश्वासी अंदाज़ की शायरी है, न कि गुस्से की। "हौले से मुस्कुराना" यह दिखाता है कि यहाँ किसी को नुकसान पहुंचाने का भाव नहीं, बल्कि अपनी खुशी और अंदाज़ से Log यानी दूसरों के बीच हल्की जलन पैदा करने का मज़ाकिया भाव है।
