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Gulistan Shayari

Tere wajood se hi mere gulistan mein raunakein hain.

Gulistan shayari mein gulistan ki har shobha aur bahar ka poora intezaam hone ka khoobsurat Urdu andaaz hai. Isi andaaz mein Haar shayari bhi padhein.

Gulistan Shayari - Bahar Aur Wajood Ke Sher

हमीं से रंगे-गुलिस्तां, हमीं से रंगे-बहार
हमीं को नज्मे-गुलिस्तां पर इख्तियार नहीं।

(रंगे-.गुलिस्तां = उद्यान या बाग की शोभा ; रंगे-बहार = हर तरफ फूलों की शोभा; नज्म = प्रबन्ध, इन्तिजाम)

Hamin se range-gulista, hamin se range-bahaar
Hamin ko nazm-e-gulistan par iktiyaar nahin

Sahir Ludhianvi

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तेरे वजूद से है मेरे गुलिस्तां में रौनकें सारी

तेरे वजूद से है, मेरे गुलिस्तां में रौनकें सारी;
तेरे बगैर इस दुनिया को, हम वीरान लिखते हैं!

Tere vajood se hai, mere gulistaan mein raunaken saaree;
Tere bagair is duniya ko, ham veeraan likhate hain!

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Frequently Asked Questions

"हमीं से रंगे-गुलिस्तां" वाली पंक्ति में इख्तियार न होने का दर्द क्या दिखाता है?
"हमीं से रंगे-गुलिस्तां, हमीं से रंगे-बहार, हमीं को नज्मे-गुलिस्तां पर इख्तियार नहीं" पंक्ति एक गहरी विडंबना दिखाती है — बाग़ की रौनक और बहार Hamारी वजह से है, फिर भी उस बाग़ के इंतज़ाम पर हमारा कोई अधिकार नहीं, यह मेहनत करने वाले की अनसुनी भूमिका पर एक मार्मिक टिप्पणी है।
तेरे वजूद से गुलिस्तां में रौनक होने वाली पंक्ति प्रेम को कैसे दर्शाती है?
"तेरे वजूद से है, मेरे गुलिस्तां में रौनकें सारी; तेरे बगैर इस दुनिया को, हम वीरान लिखते हैं" पंक्ति दिखाती है कि प्रिय की मौजूदगी ही ज़िंदगी के बाग़ में रंग भरती है, उसके बिना सब कुछ Barbaad और सूना लगने लगता है।
गुलिस्तां शायरी में बाग़-बहार की उपमा प्रेम और जीवन को कैसे जोड़ती है?
दोनों पंक्तियाँ जीवन और रिश्तों को एक गुलिस्तां (बाग़) के रूपक से जोड़ती हैं — चाहे मेहनत का अनसुना हक हो या प्रिय के बिना वीराने का एहसास, दोनों में गुलिस्तां का बिंब भावनाओं को गहराई से बयां करता है।

Ek sher yahan tere wajood se hi gulistan mein raunakein hone aur tere bagair duniya veeran lagne ka gehra ehsaas bayan karta hai. Aage Barbaad aur Gair shayari bhi padhein.