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Talabgaar Shayari

Kisi ek ki talab ho to poori duniya ki zaroorat khatm ho jaati hai.

Talabgaar shayari mein husn ki ek jhalak paane ki bekaraari aur unke nazuk haathon se milne wali sza tak ka intezaar milta hai, sadiyon purani gunahgaari jaisa ye jazba. Isi bekaraari mein Jaan shayari bhi padhein.

Talabgaar Shayari - Ishq Ki Chaahat Ke Sher

हुस्न-ए-बेनजीर के तलबगार हुए बैठे हैं,
उनकी एक झलक को बेकरार हुए बैठे हैं,
उनके नाजुक हाथों से सजा पाने को,
कितनी सदियों से गुनाहगार हुए बैठे हैं।

Husn-e-benajeer ke talabagaar hue baithe hain,
Unakee ek jhalak ko bekaraar hue baithe hain,
Unake naajuk haathon se saja paane ko,
Kitanee sadiyon se gunaahagaar hue baithe hain.

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साहिल के तलबगार यह पहले से जान लें

साहिल के तलबगार यह पहले से जान लें...
दरिया-ए-मुहब्बत में किनारे नहीं होते...!!

Saahil ke talabagaar yah pahale se jaan len...
Dariya-e-muhabbat mein kinaare nahin hote...!!

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एक तू मिल जाता... इतना काफ़ी था मेरे लिए।।
सारी दुनियाँ की तलबगार नहीं थी मैं !!

Ek too mil jaata... itana kaafee tha mere lie..
Saaree duniyaan kee talabagaar nahin thee main !!

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Frequently Asked Questions

तलबगार शायरी में "तलबगार" शब्द का क्या भाव दर्शाया गया है?
"तलबगार" यानी किसी चीज़ की गहरी चाहत रखने वाला या तलाश करने वाला — इस टॉपिक की शायरी में यह शब्द प्रेम की बेकरार तलाश, और कभी-कभी सिर्फ एक खास इंसान की चाहत तक सीमित समर्पण को दर्शाता है।
"हुस्न-ए-बेनजीर के तलबगार हुए बैठे हैं" पंक्ति में क्या भाव है?
यह पंक्ति बेइंतहा हुस्न की चाहत और बेकरार इंतज़ार को बयां करती है — "हुस्न-ए-बेनजीर के तलबगार हुए बैठे हैं, उनकी एक झलक को बेकरार हुए बैठे हैं, उनके नाजुक हाथों से सजा पाने को, कितनी सदियों से गुनाहगार हुए बैठे हैं।" यानी प्रिय की एक Jhalak पाने के लिए सदियों जैसा इंतज़ार भी कम लगता है।
"साहिल के तलबगार यह पहले से जान लें" पंक्ति का क्या संदेश है?
यह पंक्ति प्रेम की गहराई और उसकी अनिश्चितता को समझाती है — "साहिल के तलबगार यह पहले से जान लें... दरिया-ए-मुहब्बत में किनारे नहीं होते...!!" यानी जो लोग Love में सुरक्षित किनारे (साहिल) की तलाश करते हैं, उन्हें पहले ही समझ लेना चाहिए कि मोहब्बत के Dariya (सागर) में कोई तय किनारा नहीं होता — यह हमेशा अनिश्चित और गहरा होता है।
"सारी दुनियाँ की तलबगार नहीं थी मैं" पंक्ति में क्या भाव है?
यह पंक्ति समर्पित, एकनिष्ठ प्रेम की सादगी दिखाती है — "एक तू मिल जाता... इतना काफ़ी था मेरे लिए।। सारी दुनियाँ की तलबगार नहीं थी मैं!!" यानी पूरी Duniya की चाहत रखने की बजाय, सिर्फ एक प्रिय का साथ ही काफी था — यह भाव भी उसी गहरे प्रेम-समर्पण से जुड़ा है।

Ek sher yahan mohabbat ke dariya mein kinaare dhoondhne walon ko pehle hi samajh lene ki salaah deta hai, to doosra sirf ek hi shaks ki talab mein poori duniya bhula deta hai. Aage Duniya aur 2 Line shayari bhi padhein.