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Dikhawa Shayari

Shareef hone ka dikhawa mat karo, hum khamosh hain na-samajh nahi.

Dikhawa shayari mein shareef hone ka dikhawa karne walon ko chup rehkar bhi na-samajh na hone ka jawab diya gaya hai. Isi tewar mein Ham shayari bhi padhein.

Dikhawa Shayari - Khamoshi Aur Jhoothe Sher
दिखावा मत कर मेरे शहर में शरीफ होने का

दिखावा मत कर मेरे शहर में शरीफ होने का...
हम खामोश तो है लेकिन ना-समझ नहीं...!!

Dikhaava mat kar mere shahar mein shareeph hone ka...
Ham khaamosh to hai lekin na-samajh nahin...!!

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चलो आज फिर से दिखावा करते हैं...
तुम पुछो ... कैसे हो ? मै कहूँ ....बस ठीक

Chalo aaj phir se dikhaava karate hain...
Tum puchho ... kaise ho ? mai kahoon ....bas theek

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Frequently Asked Questions

दिखावा शायरी में "शरीफ होने का दिखावा मत कर" वाला शेर क्या कहता है?
यह शेर एक सीधी चेतावनी है, कि भलमनसाहत का दिखावा करने वालों को खामोश लोग भी अच्छी तरह पहचानते हैं, बस कुछ कहते नहीं। पंक्ति है, "दिखावा मत कर मेरे शहर में शरीफ होने का... हम खामोश तो है लेकिन ना-समझ नहीं...!!" यह Khamosh रहने और Samajh न होने के फर्क को साफ करता है, यह बताते हुए कि Shahar की भीड़ में सब कुछ देखा और समझा जा रहा है।
"चलो आज फिर से दिखावा करते हैं" वाली पंक्ति किस रिश्ते की सच्चाई दिखाती है?
यह पंक्ति उस रोजमर्रा के औपचारिक दिखावे की बात करती है, जहाँ हाल पूछा भी जाता है और जवाब भी दिया जाता है, लेकिन असली हाल कभी बयां नहीं होता। शेर है, "चलो आज फिर से दिखावा करते हैं... तुम पुछो ... कैसे हो ? मै कहूँ ....बस ठीक।" यह उस खामोश दूरी को दिखाता है जो कभी-कभी सबसे करीबी रिश्तों में भी बनी रहती है, हर Aaj एक जैसे दिखावटी जवाबों में गुजर जाता है।
दिखावा शायरी असल जिंदगी की किस आम आदत पर बात करती है?
यह विषय हमारी रोजमर्रा की उस आदत पर बात करता है जहाँ हम अक्सर अपनी असली भावनाओं को छुपाकर एक बनावटी चेहरा दिखाते हैं, चाहे वह शराफत का हो या खुशहाली का। यह शायरी उस दिखावे के पीछे छुपी असली सच्चाई को पहचानने और स्वीकार करने की बात करती है।

Ek sher yahan roz 'kaise ho' poochne par 'bas theek hoon' kehkar apna dard chhupane ka dikhawa bayan karta hai. Aage Khamosh aur Aaj shayari bhi padhein.