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Dahshat Shayari

Sach kehne ki himmat ho toh dahshat ki jagah nahi bachti.

Dahshat shayari mein bebaak hokar sach kehne ki himmat aur dahshat ke saaye mein haq ki himayat na hone ki baat hai. Isi bebaaki mein Bebaak shayari bhi padhein.

Dahshat Shayari - Himmat Aur Ishq Ke Gehre Sher
कहनी हो जो भी बात बेबाक कहा कर

कहनी हो जो भी बात बेबाक कहा कर...
दहशत के साथ हक़ की हिमायत नही होती...!!

Kahanee ho jo bhee baat bebaak kaha kar...
Dahashat ke saath haq kee himaayat nahee hotee...!!

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पाने की बेकरारी और खोने की दहशत,
इन्हीं बेचैनियों का नाम है मोहब्बत !!

Paane kee bekaraaree aur khone kee dahashat,
Inheen bechainiyon ka naam hai mohabbat !!

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Frequently Asked Questions

दहशत के साथ हक़ की हिमायत न होने वाली शायरी का क्या मतलब है?
एक शायरी में लिखा है, "कहनी हो जो भी बात बेबाक कहा कर... दहशत के साथ हक़ की हिमायत नही होती...!" यह साफ संदेश देती है कि अपनी बात या अपने हक़ की रक्षा डर या दहशत के साथ नहीं की जा सकती - सच बोलने के लिए निडरता ज़रूरी है, यह भाव Bebaak यानी बेबाकी से जुड़ा है।
मोहब्बत में खोने की दहशत वाली शायरी क्या कहती है?
शेर कहता है, "पाने की बेकरारी और खोने की दहशत, इन्हीं बेचैनियों का नाम है मोहब्बत।" यहाँ दहशत का इस्तेमाल डरावने अर्थ में नहीं, बल्कि प्रेम में प्रिय को खो देने के गहरे भावनात्मक डर के लिए हुआ है - मोहब्बत की परिभाषा ही इन बेचैनियों में छिपी बताई गई है, यह भाव Hak से जुड़ी शायरी में भी झलकता है जहाँ अपनी बात कहने के हक़ की बात होती है।
दहशत शायरी में यह शब्द हमेशा डर के मतलब में ही इस्तेमाल होता है?
नहीं, दोनों शेरों में दहशत को अलग-अलग भावनात्मक रंगों में बरता गया है - एक में यह डर के आगे झुककर हक़ की बात न कह पाने की कमज़ोरी बताता है, तो दूसरे में यह मोहब्बत में किसी को खो देने की गहरी बेचैनी को दिखाता है। दोनों ही जगह असली मतलब सीधा भय नहीं, बल्कि दिल की एक गहरी हलचल है - ऐसी छोटी पर गहरी दो-पंक्ति की शायरियाँ 2 Line सेक्शन में भी मिलती हैं।

Ek sher yahan pane ki bekaraari aur khone ki dahshat ko hi mohabbat ki bechaini bataata hai. Aage Chain aur Hak shayari bhi padhein.