हम सोच रहें हैं मुद्दत से अब उम्र ग़ुज़ारें भी तो कहाँ
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हम सोच रहें हैं मुद्दत से अब उम्र ग़ुज़ारें भी तो कहाँ,
सेहरा में खुशी के फूल नहीं शहरों में ग़मों के साये हैं
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हम सोच रहें हैं मुद्दत से अब उम्र ग़ुज़ारें भी तो कहाँ,
सेहरा में खुशी के फूल नहीं शहरों में ग़मों के साये हैं
Ham soch rahen hain muddat se ab umr guzaaren bhee to kahaan,
Sehara mein khushee ke phool nahin shaharon mein gamon ke saaye hain
