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Akhbar Shayari

Har akhbar ke peeche ek chhupi kahani

Bazaar mein muft kuch nahi milta, aur kisan ki takleef bhi akhbar ki surkhiyon tak kabhi nahi pahunchti - yeh seedhi si sachai is topic ki shayari mein baar baar ubharti hai. Isi tarah ki roz ki baat Aaj mein bhi milegi.

Akhbar Shayari - Khabaron Ke Peeche Ki Kahani

चमक सूरज की नहीं किरदार की है,
खबर ये आसमान के अखबार की है !!
में चालू तो मेरे संग कारवां चले,
बात गुरुर की नहीं एतबार की है !!

Chamak suraj ki nahi kirdaar ki hai,
Khabar ye aasmaan ke akhabaar kee hai !!
Mein chaaloo to mere sang kaaravaan chale,
Baat gurur kee nahin etabaar kee hai !!

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शामें मेरी अख़बार में,
सुबह बिस्तर में, गुजर रही है।

Shaamen meree akhabaar mein,
Subah bistar mein, gujar rahee hai.

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मुफ़्त की कोई चीज बाजार में नहीं मिलती,
किसान के मरने की सुर्खियां अखबार में नहीं मिलती।

Muft kee koee cheej baajaar mein nahin milatee,
Kisaan ke marane kee surkhiyaan akhabaar mein nahin milatee.

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उन्हें शोक था अखबारों के पन्नो पर बने रहने का,
वक़्त ऐसा गुज़रा की वह रद्दी के भाव बिक गये​।

Unhen shok tha akhabaaron ke panno par bane rahane ka,
Vaqt aisa guzara kee vah raddee ke bhaav bik gaye​.

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2 Line Shayari

इंसान कागज पर रख कर खाना खाये तो कैसे खाये साहिब
खून से लथपथ आता है हर अखबार आजकल !!

Insaan kaagaj par rakh kar khaana khaaye to kaise khaaye saahib
Khoon se lathapath aata hai har akhabaar aajakal !!

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सो जाते हैं फूटपाथ पे अख़बार बिछा कर...
मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते…!!

So jaate hain phootapaath pe akhabaar bichha kar...
Mazadoor kabhee neend kee golee nahin khaate…!!

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घर में अखबार भी अब किसी बुजुर्ग सा लगता है

घर में अखबार भी अब किसी बुजुर्ग सा लगता है,
जरूरत किसी को नहीं, जरूरी फिर भी है

Ghar mein akhabaar bhee ab kisee bujurg sa lagata hai,
Jaroorat kisee ko nahin, jarooree phir bhee hai

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Frequently Asked Questions

किरदार की चमक को अखबार से जोड़ने वाली शायरी क्या कहती है?
एक शायरी में लिखा है, "चमक सूरज की नहीं किरदार की है, खबर ये आसमान के अखबार की है, में चालू तो मेरे संग कारवां चले, बात गुरुर की नहीं एतबार की है।" यहाँ असली पहचान किरदार और भरोसे से बनती है, न कि दिखावे या घमंड से - यही खबर मानो आसमान के अखबार में छपी हो।
अखबार में गुज़रती शामों वाली शायरी में क्या तन्हाई झलकती है?
एक छोटी सी शायरी कहती है, "शामें मेरी अख़बार में, सुबह बिस्तर में, गुजर रही है।" यह अकेलेपन और खालीपन की भावना दिखाती है, जहाँ ज़िंदगी की रौनक की जगह सिर्फ अखबार पढ़ते हुए शामें बीत रही हैं।
किसान की मौत की खबर न छपने वाली शायरी में क्या तंज़ है?
एक तीखी शायरी कहती है, "मुफ़्त की कोई चीज बाजार में नहीं मिलती, किसान के मरने की सुर्खियां अखबार में नहीं मिलती।" यह मीडिया की उस उदासीनता पर सीधा व्यंग्य है जहाँ किसान की मौत जैसी गंभीर बात को अखबारों में जगह नहीं मिलती, जबकि बाकी हर चीज़ की कीमत तय है।
अखबार के पन्नों पर बने रहने की चाह वाली शायरी का क्या अंजाम बताया गया है?
शेर कहता है, "उन्हें शोक था अखबारों के पन्नो पर बने रहने का, वक़्त ऐसा गुज़रा की वह रद्दी के भाव बिक गये।" यह शोहरत की चाहत की क्षणभंगुरता दिखाता है - जो कल सुर्खियों में था, वक़्त बदलते ही रद्दी बनकर बिक जाता है, ठीक वैसे ही जैसे पुराना Haar या टूटी उम्मीद का भाव होता है।
अखबार शायरी में समाज पर सबसे तीखी टिप्पणी किसमें है?
किसान की मौत की सुर्खियां न मिलने वाली शायरी इस विषय की सबसे तीखी सामाजिक टिप्पणी है - यह मीडिया की प्राथमिकताओं और आम आदमी की अनदेखी दोनों पर सवाल उठाती है। ऐसे गंभीर सामाजिक भाव Ghar और Door से जुड़ी शायरी में भी कभी-कभी झलकते हैं जहाँ आम इंसान की तकलीफ का ज़िक्र होता है।

Footpath par so jaane wale mazdoor akhbar ko hi bistar bana lete hain, aur ghar ka purana akhbar bhi ab kisi bujurg jaisa lagta hai - zaroori magar anadeka kiya hua. Judi hui shayari Apne aur Door mein bhi dekhein.