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Manushy Anmol Vachan

रोना छोड़कर अपने पैरों पर खड़े होने की प्रेरणा देने वाला अनमोल वचन।

देश को आज सबसे ज़्यादा किस चीज़ की आवश्यकता है, इस सवाल का जवाब यह अनमोल वचन मज़बूत मांसपेशियों और दृढ़ स्नायुओं की भाषा में देता है। रोने का दौर खत्म कर अपने पैरों पर खुद खड़े होने का आह्वान इसमें साफ झलकता है।

आज हमारे देश को आवश्‍यकता है.
लोहे के समान मांसपेशियों और वज्र के समान स्‍नायुओं की.
हम बहुत दिनों तक रो चुके,
अब और रोने की आवश्‍यकता नहीं,
अब अपने पैरों पर उठ खड़े हो एवं मनुष्‍य बनो.

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Frequently Asked Questions

यह वचन 'मनुष्य बनो' से क्या अभिप्राय रखता है?
यह वचन रोना छोड़कर उठ खड़े होने और सच्चे अर्थों में मनुष्य बनने का आह्वान करता है। इसका आशय आत्मबल और साहस अपनाने से है, न कि किसी शाब्दिक बदलाव से।
इस वचन में लोहे और वज्र की उपमा क्यों दी गई है?
लोहे जैसी मांसपेशियों और वज्र जैसे स्नायुओं की उपमा शारीरिक व मानसिक दृढ़ता दर्शाने के लिए दी गई है। यह देश को मजबूत बनाने की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
यह वचन किन जुड़े विषयों को छूता है?
यह विचार देश की Aavashyakata और Desh के प्रति जिम्मेदारी से जुड़ा है, और इसकी प्रेरक भावना Sakaratmak वचनों की श्रेणी में भी दिखाई देती है।

यह वचन सीधे तौर पर देश के प्रति ज़िम्मेदारी और आत्मबल जगाने की भावना से जुड़ा है, जहां कमजोरी की जगह हिम्मत को अपनाने पर ज़ोर है। ऐसी ही जोश भरने वाली सोच सकारात्मक वचनों के संग्रह में भी मिलती है।