वो नाराज़ हैं हमसे कि हम कुछ लिखते नहीं
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वो नाराज़ हैं हमसे कि हम कुछ लिखते नहीं,
कहाँ से लाएं लफ्ज़ जब हमको मिलते नहीं,
दिल की ज़ुबान होती तो बता देते शायद,
वो ज़ख्म कैसे दिखाए जो दिखते ही नहीं।
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वो नाराज़ हैं हमसे कि हम कुछ लिखते नहीं,
कहाँ से लाएं लफ्ज़ जब हमको मिलते नहीं,
दिल की ज़ुबान होती तो बता देते शायद,
वो ज़ख्म कैसे दिखाए जो दिखते ही नहीं।
Woh Naraj Hain Humse Ke Hum Kuchh Likhte Nahi,
Kahan Se Layein Lafz Jab Humko Milte Nahi,
Dil Ki Jubaan Hoti Toh Bata Dete Shayad,
Woh Zakhm Kaise Dikhayein Jo Dikhte Hi Nahi.
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ये सोचकर अक्सर फूल भी चुपचाप ज़ख्म दे जातें हैं !
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