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Insaaf Shayari

Ishq hi kathghare mein pesh hua, kaatil bhi wahi thehra.

Insaaf shayari mein ek anokha khayal hai ki ishq abhi insaaf ke kathghare mein pesh hi hua tha ki sab ek saath bol uthe, yahi kaatil hai. Isi andaaz mein Nyay shayari bhi padhein.

इश्क अभी पेश ही हुआ था इंसाफ के कटघरे में,
सभी बोल उठे यही कातिल है.. यही कातिल है।

Ishk abhee pesh hee hua tha insaaph ke kataghare mein,
Sabhee bol uthe yahee kaatil hai.. yahee kaatil hai.

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Frequently Asked Questions

"इंसाफ" शायरी में अदालत का ज़िक्र किस अर्थ में किया गया है?
यहाँ अदालत और इंसाफ का ज़िक्र एक काव्यात्मक रूपक के तौर पर है, असली अपराध या मुकदमे की बात नहीं। जैसे पंक्ति कहती है — "इश्क अभी पेश ही हुआ था इंसाफ के कटघरे में, सभी बोल उठे यही कातिल है.. यही कातिल है।" यहाँ "कातिल" होने का मतलब है किसी के प्यार में पड़ जाना, जिसे दुनिया दोषी ठहरा देती है।
इस शायरी में प्यार को "कातिल" और "मुजरिम" जैसा क्यों दिखाया गया है?
यह अंदाज़ बताता है कि इश्क को अक्सर लोग गलत नज़र से देखते हैं, मानो वह कोई गुनाह हो। कटघरे और Nyay के प्रतीकों का इस्तेमाल दिखाता है कि प्रेमी को समाज की Nyayalay जैसी सोच के सामने खुद को सही साबित करना पड़ता है, हालांकि यहाँ कोई असली अदालत या कानूनी कार्यवाही नहीं है।

Ek sher yahan mohabbat aur insaaf ke rishte ko ek anokhe nazariye se dikhata hai. Aage Kanoon aur Jaj shayari bhi padhein.