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Daakiya Shayari

Kabhi ek khat, poori kahani keh deta tha.

Daakiya shayari un dinon ki baat karti hai jab ek khat hi dil ki asli zubaan hota tha, aur daakiya usse manzil tak pahunchata tha. Isi yaad mein Dakghar shayari bhi padhein.

Daakiya Shayari - Khaton Aur Yaadon Ka Safar

ख़त जो लिखा मैनें इंसानियत के पते पर!
डाकिया ही चल बसा शहर ढूंढ़ते ढूंढ़ते!

Khat jo likha mainen insaaniyat ke pate par!
Daakiya hee chal basa shahar dhoondhate dhoondhate!

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सीधा सादा डाकिया जादू करे महान
एक ही थैले में भरे आँसू और मुस्कान

Seedha saada daakiya jaadoo kare mahaan
Ek hee thaile mein bhare aansoo aur muskaan

Shayari by Nida Fazli

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ख़त जो लिखा मैनें #वफादारी के पते पर,
#डाकिया ही चल बसा शहर ढूंढ़ते ढूंढ़ते

Khat jo likha mainen #vaphaadaaree ke pate par,
#daakiya hee chal basa shahar dhoondhate dhoondhate

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लाख पता बदला, मगर पहुँच ही गया;
ये ग़म भी था, कोई डाकिया ज़िद्दी सा!

Laakh pata badala, magar pahunch hee gaya;
Ye gam bhee tha, koee daakiya ziddee sa!

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2 Line Shayari

कुछ ख़त आज फिर डाकघर से लौट आये

कुछ ख़त ..आज फिर.. डाकघर से लौट आये,,,
डाकिया बोला जज्बातों का कोई पता नहीं होता !!

Kuchh khat ..aaj phir.. daakaghar se laut aaye,,,
Daakiya bola jajbaaton ka koee pata nahin hota !!

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ये सर्द रातें फिर बनी हैं डाकिया...
तेरे अनलिखे ख़त मुझ तक पहुँचने लगे है...

Ye sard raaten phir banee hain daakiya...
Tere analikhe khat mujh tak pahunchane lage hai...

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Frequently Asked Questions

डाकिया शायरी में "इंसानियत के पते पर ख़त" वाला शेर किस बात की ओर इशारा करता है?
यह शेर बताता है कि आज इंसानियत को ढूंढना कितना मुश्किल हो गया है, इतना कि खुद डाकिया भी उसका पता तलाशते-तलाशते थक गया। पंक्ति है, "ख़त जो लिखा मैनें इंसानियत के पते पर! डाकिया ही चल बसा शहर ढूंढ़ते ढूंढ़ते!" यह एक गहरा व्यंग्य है समाज में Aadmi के भीतर से खोती जा रही इंसानियत पर।
डाकिया के थैले में आँसू और मुस्कान वाली पंक्ति का क्या भाव है?
यह पंक्ति डाकिया को जिंदगी के हर रंग का साथी बताती है, जो खुशी की खबर भी लाता है और गम की भी। शेर है, "सीधा सादा डाकिया जादू करे महान, एक ही थैले में भरे आँसू और मुस्कान।" इसमें Aansoo और मुस्कान दोनों एक साथ, जिंदगी की असली तस्वीर की तरह पेश किए गए हैं।
"वफादारी के पते पर ख़त" वाला शेर पहले वाले शेर से किस तरह जुड़ा है?
यह एक जैसा ही भाव लिए है, बस "इंसानियत" की जगह "वफादारी" शब्द रखा गया है, "ख़त जो लिखा मैनें #वफादारी के पते पर, #डाकिया ही चल बसा शहर ढूंढ़ते ढूंढ़ते।" यह दिखाता है कि आजकल सच्ची वफादारी भी उतनी ही दुर्लभ हो चुकी है जितनी इंसानियत, यही ग़म भरा एहसास दोनों पंक्तियों में एक जैसा झलकता है।
"जिद्दी डाकिया" वाली पंक्ति किस्मत के बारे में क्या कहती है?
यह शेर बताता है कि जो होना तय है, वह हर हाल में आपको ढूंढ ही लेता है, चाहे कितना भी पता बदल लिया जाए। पंक्ति है, "लाख पता बदला, मगर पहुँच ही गया; ये ग़म भी था, कोई डाकिया ज़िद्दी सा!" यह ग़म को एक ऐसे Dakghar के जिद्दी डाकिये जैसा बताता है जो टालने पर भी टलता नहीं।
डाकिया को शायरी में प्रतीक के रूप में क्यों चुना जाता है?
डाकिया संदेश पहुँचाने वाला होता है, इसलिए शायरी में उसे अक्सर भावनाओं, खबरों और किस्मत के संदेशवाहक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। चाहे वह इंसानियत का पता हो या किसी Ghar तक पहुँचने वाला ग़म, डाकिया हमेशा कुछ न कुछ लेकर आता है, यही इस विषय को इतना भावुक बनाता है।

Kuch sher yahan un anlikhe khaton ki baat bhi karte hain jo kabhi bheje hi nahi gaye. Aage Aadmi aur Aansoo shayari bhi padhein.