दिए हैं ज़ख़्म तो मरहम का तकल्लुफ न करो
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दिए हैं ज़ख़्म तो मरहम का तकल्लुफ न करो,
कुछ तो रहने दो मेरी ज़ात पे एहसान अपना।
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दिए हैं ज़ख़्म तो मरहम का तकल्लुफ न करो,
कुछ तो रहने दो मेरी ज़ात पे एहसान अपना।
Diye Hain Zakhm Toh Marham Ka Takalluf Na Karo,
Kuchh Toh Rahne Do Meri Zaat Pe Ehsaan Apna.
Today's Shayari
इल्ज़ाम तो हर हाल में काँटों पे ही लगेगा,
ये सोचकर अक्सर फूल भी चुपचाप ज़ख्म दे जातें हैं !
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