क़ज़ा समझकर हम रातों को जाग लेते हैं
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क़ज़ा समझकर हम रातों को जाग लेते हैं,
ज़िक्र जिस दिन तुम्हारा छूट जाता है।
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क़ज़ा समझकर हम रातों को जाग लेते हैं,
ज़िक्र जिस दिन तुम्हारा छूट जाता है।
Qaza Samajh Kar Raaton Ko Jaag Lete Hain,
Zikr Jis Din Tumhara Chhoot Jata Hai.
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