इसी ख्याल से गुज़री है शाम-ए-ग़म अक्सर
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इसी ख्याल से गुज़री है शाम-ए-ग़म अक्सर,
कि दर्द हद से जो गुज़रेगा तो मुस्कुरा दूंगा।
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इसी ख्याल से गुज़री है शाम-ए-ग़म अक्सर,
कि दर्द हद से जो गुज़रेगा तो मुस्कुरा दूंगा।
Isi Khayal Se Gujri Hai Shaam-e-Gham Aksar,
Ki Dard Had Se Jo Gujrega To Muskura Dunga.
