प्रेम की गली अति सांकरी है
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जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहि। प्रेम गली अति सांकरी, तामे दो न समाहि। — कबीर
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जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहि। प्रेम गली अति सांकरी, तामे दो न समाहि। — कबीर
