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भजन संहिता अध्याय 4 (IRVHIN)

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भजन संहिता अध्याय 4 (IRVHIN)
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1 हे मेरे धर्ममय परमेश्वर, जब मैं पुकारूँ तब तू मुझे उत्तर दे; जब मैं संकट में पड़ा तब तूने मुझे सहारा दिया। मुझ पर अनुग्रह कर और मेरी प्रार्थना सुन ले।

2 हे मनुष्यों, कब तक मेरी महिमा का अनादर होता रहेगा? तुम कब तक व्यर्थ बातों से प्रीति रखोगे और झूठी युक्ति की खोज में रहोगे? (सेला)

3 यह जान रखो कि यहोवा ने भक्त को अपने लिये अलग कर रखा है; जब मैं यहोवा को पुकारूँगा तब वह सुन लेगा।

4 काँपते रहो और पाप मत करो; अपने-अपने बिछौने पर मन ही मन में ध्यान करो और चुपचाप रहो। (सेला)

5 धार्मिकता के बलिदान चढ़ाओ, और यहोवा पर भरोसा रखो।

6 बहुत से हैं जो कहते हैं, “कौन हमको कुछ भलाई दिखाएगा?” हे यहोवा, तू अपने मुख का प्रकाश हम पर चमका!

7 तूने मेरे मन में उससे कहीं अधिक आनन्द भर दिया है, जो उनको अन्न और दाखमधु की बढ़ती से होता है।

8 मैं शान्ति से लेट जाऊँगा और सो जाऊँगा; क्योंकि, हे यहोवा, केवल तू ही मुझ को निश्चिन्त रहने देता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

What does the psalmist ask for in Psalms 4?
He asks God to hear his prayer and have mercy, recalling that God has helped him in distress before (v.1), while rebuking others for turning his glory into shame and loving vanity (v.2).
What does Psalms 4:4 advise about anger?
It says, 'Stand in awe, and sin not: commune with your own heart upon your bed, and be still' (v.4), counseling quiet self-examination rather than acting out in anger.
What does Psalms 4:8 say about sleeping in peace?
The psalm closes with, 'I will both lay me down in peace, and sleep: for thou, LORD, only makest me dwell in safety' (v.8), a trust in God's protection similar to Proverbs 3:24.