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भजन संहिता अध्याय 29 (IRVHIN)

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भजन संहिता अध्याय 29 (IRVHIN)
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1 हे परमेश्वर के पुत्रों, यहोवा का, हाँ, यहोवा ही का गुणानुवाद करो, यहोवा की महिमा और सामर्थ्य को सराहो।

2 यहोवा के नाम की महिमा करो; पवित्रता से शोभायमान होकर यहोवा को दण्डवत् करो।

3 यहोवा की वाणी मेघों के ऊपर सुनाई देती है; प्रतापी परमेश्वर गरजता है, यहोवा घने मेघों के ऊपर रहता है।

4 यहोवा की वाणी शक्तिशाली है, यहोवा की वाणी प्रतापमय है।

5 यहोवा की वाणी देवदारों को तोड़ डालती है; यहोवा लबानोन के देवदारों को भी तोड़ डालता है।

6 वह लबानोन को बछड़े के समान और सिर्योन को साँड़ के समान उछालता है।

7 यहोवा की वाणी आग की लपटों को चीरती है।

8 यहोवा की वाणी वन को हिला देती है, यहोवा कादेश के वन को भी कँपाता है।

9 यहोवा की वाणी से हिरनियों का गर्भपात हो जाता है। और जंगल में पतझड़ होता है; और उसके मन्दिर में सब कोई “महिमा ही महिमा” बोलते रहते है।

10 जल-प्रलय के समय यहोवा विराजमान था; और यहोवा सर्वदा के लिये राजा होकर विराजमान रहता है।

11 यहोवा अपनी प्रजा को बल देगा; यहोवा अपनी प्रजा को शान्ति की आशीष देगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

What is Psalm 29 about?
Psalm 29 calls heavenly beings to 'Give unto the LORD glory and strength' (v.1) and then describes 'the voice of the LORD' as a thunderstorm powerful enough to break the cedars of Lebanon and shake the wilderness of Kadesh (vv.3-9).
What does 'the voice of the LORD' refer to in this psalm?
It's used seven times as a refrain for thunder, picturing God's power moving through a storm -- breaking cedars (v.5), dividing flames of fire (v.7), and making the wilderness shake (v.8).
How does the psalm end?
It closes with a blessing: 'The LORD will give strength unto his people; the LORD will bless his people with peace' (v.11), a note similar to the priestly blessing in Numbers 6:24-27.