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भजन संहिता अध्याय 28 (IRVHIN)

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भजन संहिता अध्याय 28 (IRVHIN)
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1 हे यहोवा, मैं तुझी को पुकारूँगा; हे मेरी चट्टान, मेरी पुकार अनसुनी न कर, ऐसा न हो कि तेरे चुप रहने से मैं कब्र में पड़े हुओं के समान हो जाऊँ जो पाताल में चले जाते हैं।

2 जब मैं तेरी दुहाई दूँ, और तेरे पवित्रस्थान की भीतरी कोठरी की ओर अपने हाथ उठाऊँ, तब मेरी गिड़गिड़ाहट की बात सुन ले।

3 उन दुष्टों और अनर्थकारियों के संग मुझे न घसीट; जो अपने पड़ोसियों से बातें तो मेल की बोलते हैं, परन्तु हृदय में बुराई रखते हैं।

4 उनके कामों के और उनकी करनी की बुराई के अनुसार उनसे बर्ताव कर, उनके हाथों के काम के अनुसार उन्हें बदला दे; उनके कामों का पलटा उन्हें दे।

5 क्योंकि वे यहोवा के कामों को और उसके हाथ के कामों को नहीं समझते, इसलिए वह उन्हें पछाड़ेगा और फिर न उठाएगा।

6 यहोवा धन्य है; क्योंकि उसने मेरी गिड़गिड़ाहट को सुना है।

7 यहोवा मेरा बल और मेरी ढाल है; उस पर भरोसा रखने से मेरे मन को सहायता मिली है; इसलिए मेरा हृदय प्रफुल्लित है; और मैं गीत गाकर उसका धन्यवाद करूँगा।

8 यहोवा अपने लोगों की सामर्थ्य है, वह अपने अभिषिक्त के लिये उद्धार का दृढ़ गढ़ है।

9 हे यहोवा अपनी प्रजा का उद्धार कर, और अपने निज भाग के लोगों को आशीष दे; और उनकी चरवाही कर और सदैव उन्हें सम्भाले रह।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

What happens across Psalm 28?
Psalm 28 is a cry for God to hear a prayer for deliverance and not let the speaker be swept away 'with the wicked' (v.3), followed by confidence that God has heard, ending with a blessing on God's people (v.9).
What does the psalm ask God to do to the wicked?
Verse 4 asks God to 'Give them according to their deeds... render to them their desert' because 'they regard not the works of the LORD' (v.5).
How does the psalm's mood shift?
It turns from anxious pleading to praise at verse 6 -- 'Blessed be the LORD, because he hath heard the voice of my supplications' -- a turn similar to the joy described in Psalms 30:11-12.