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भजन संहिता अध्याय 142 (IRVHIN)

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भजन संहिता अध्याय 142 (IRVHIN)
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1 मैं यहोवा की दुहाई देता, मैं यहोवा से गिड़गिड़ाता हूँ,

2 मैं अपने शोक की बातें उससे खोलकर कहता, मैं अपना संकट उसके आगे प्रगट करता हूँ।

3 जब मेरी आत्मा मेरे भीतर से व्याकुल हो रही थी, तब तू मेरी दशा को जानता था! जिस रास्ते से मैं जानेवाला था, उसी में उन्होंने मेरे लिये फंदा लगाया।

4 मैंने दाहिनी ओर देखा, परन्तु कोई मुझे नहीं देखता। मेरे लिये शरण कहीं नहीं रही, न मुझ को कोई पूछता है।

5 हे यहोवा, मैंने तेरी दुहाई दी है; मैंने कहा, तू मेरा शरणस्थान है, मेरे जीते जी तू मेरा भाग है।

6 मेरी चिल्लाहट को ध्यान देकर सुन, क्योंकि मेरी बड़ी दुर्दशा हो गई है! जो मेरे पीछे पड़े हैं, उनसे मुझे बचा ले; क्योंकि वे मुझसे अधिक सामर्थी हैं।

7 मुझ को बन्दीगृह से निकाल कि मैं तेरे नाम का धन्यवाद करूँ! धर्मी लोग मेरे चारों ओर आएँगे; क्योंकि तू मेरा उपकार करेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

What is Psalm 142 about?
It's a cry of distress in which the psalmist "poured out my complaint before" God, describing a moment when "no man cared for my soul" and refuge failed him (vv.2-4).
What does verse 7 ask for?
V.7 asks, "Bring my soul out of prison, that I may praise thy name," a plea for deliverance so he can publicly thank God among "the righteous."
What does the psalmist call God in verse 5?
V.5 calls him "my refuge and my portion in the land of the living," expressing that God is his sole source of security amid persecution. Compare Romans 8:26.