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IRVHIN

भजन संहिता अध्याय 141 (IRVHIN)

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भजन संहिता अध्याय 141 (IRVHIN)
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1 हे यहोवा, मैंने तुझे पुकारा है; मेरे लिये फुर्ती कर! जब मैं तुझको पुकारूँ, तब मेरी ओर कान लगा!

2 मेरी प्रार्थना तेरे सामने सुगन्ध धूप, और मेरा हाथ फैलाना, संध्याकाल का अन्नबलि ठहरे!

3 हे यहोवा, मेरे मुँह पर पहरा बैठा, मेरे होठों के द्वार की रखवाली कर!

4 मेरा मन किसी बुरी बात की ओर फिरने न दे; मैं अनर्थकारी पुरुषों के संग, दुष्ट कामों में न लगूँ, और मैं उनके स्वादिष्ट भोजनवस्तुओं में से कुछ न खाऊँ!

5 धर्मी मुझ को मारे तो यह करुणा मानी जाएगी, और वह मुझे ताड़ना दे, तो यह मेरे सिर पर का तेल ठहरेगा; मेरा सिर उससे इन्कार न करेगा। दुष्ट लोगों के बुरे कामों के विरुद्ध मैं निरन्तर प्रार्थना करता रहूँगा।

6 जब उनके न्यायी चट्टान के ऊपर से गिराए गए, तब उन्होंने मेरे वचन सुन लिए; क्योंकि वे मधुर हैं।

7 जैसे भूमि में हल चलने से ढेले फूटते हैं, वैसे ही हमारी हड्डियाँ अधोलोक के मुँह पर छितराई गई हैं।

8 परन्तु हे यहोवा प्रभु, मेरी आँखें तेरी ही ओर लगी हैं; मैं तेरा शरणागत हूँ; तू मेरे प्राण जाने न दे!

9 मुझे उस फंदे से, जो उन्होंने मेरे लिये लगाया है, और अनर्थकारियों के जाल से मेरी रक्षा कर!

10 दुष्ट लोग अपने जालों में आप ही फँसें, और मैं बच निकलूँ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

What is Psalm 141 about?
It's an evening prayer asking God to "set a watch... before my mouth; keep the door of my lips" (v.3) and to keep the psalmist's heart from being drawn "to practise wicked works" (v.4).
What does verse 5 say about correction from the righteous?
V.5 says, "Let the righteous smite me; it shall be a kindness... it shall be an excellent oil," welcoming honest rebuke from godly people rather than resenting it.
How does the psalm end?
Verses 9-10 ask God to keep him "from the snares which they have laid," so the wicked fall into their own traps "whilst that I withal escape." Compare James 1:26.