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भजन संहिता अध्याय 138 (IRVHIN)

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भजन संहिता अध्याय 138 (IRVHIN)
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1 मैं पूरे मन से तेरा धन्यवाद करूँगा; देवताओं के सामने भी मैं तेरा भजन गाऊँगा।

2 मैं तेरे पवित्र मन्दिर की ओर दण्डवत् करूँगा, और तेरी करुणा और सच्चाई के कारण तेरे नाम का धन्यवाद करूँगा; क्योंकि तूने अपने वचन को और अपने बड़े नाम को सबसे अधिक महत्त्व दिया है।

3 जिस दिन मैंने पुकारा, उसी दिन तूने मेरी सुन ली, और मुझ में बल देकर हियाव बन्धाया।

4 हे यहोवा, पृथ्वी के सब राजा तेरा धन्यवाद करेंगे, क्योंकि उन्होंने तेरे वचन सुने हैं;

5 और वे यहोवा की गति के विषय में गाएँगे, क्योंकि यहोवा की महिमा बड़ी है।

6 यद्यपि यहोवा महान है, तो भी वह नम्र मनुष्य की ओर दृष्टि करता है; परन्तु अहंकारी को दूर ही से पहचानता है।

7 चाहे मैं संकट के बीच में चलूँ तो भी तू मुझे सुरक्षित रखेगा, तू मेरे क्रोधित शत्रुओं के विरुद्ध हाथ बढ़ाएगा, और अपने दाहिने हाथ से मेरा उद्धार करेगा।

8 यहोवा मेरे लिये सब कुछ पूरा करेगा; हे यहोवा, तेरी करुणा सदा की है। तू अपने हाथों के कार्यों को त्याग न दे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

What is Psalm 138 about?
It's a psalm of thanksgiving in which the psalmist vows to praise God "with my whole heart" (v.1) for answering him and strengthening his soul "in the day when I cried" (v.3).
What does verse 6 say about God's regard for the lowly?
V.6 says, "Though the LORD be high, yet hath he respect unto the lowly: but the proud he knoweth afar off."
What promise does the closing verse make?
V.8 says, "The LORD will perfect that which concerneth me... forsake not the works of thine own hands," expressing confidence God will complete what he started. Compare Philippians 1:6.