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भजन संहिता अध्याय 137 (IRVHIN)

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भजन संहिता अध्याय 137 (IRVHIN)
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1 बाबेल की नदियों के किनारे हम लोग बैठ गए, और सिय्योन को स्मरण करके रो पड़े!

2 उसके बीच के मजनू वृक्षों पर हमने अपनी वीणाओं को टाँग दिया;

3 क्योंकि जो हमको बन्दी बनाकर ले गए थे, उन्होंने वहाँ हम से गीत गवाना चाहा, और हमारे रुलाने वालों ने हम से आनन्द चाहकर कहा, “सिय्योन के गीतों में से हमारे लिये कोई गीत गाओ!”

4 हम यहोवा के गीत को, पराए देश में कैसे गाएँ?

5 हे यरूशलेम, यदि मैं तुझे भूल जाऊँ, तो मेरा दाहिना हाथ सूख जाए!

6 यदि मैं तुझे स्मरण न रखूँ, यदि मैं यरूशलेम को, अपने सब आनन्द से श्रेष्ठ न जानूँ, तो मेरी जीभ तालू से चिपट जाए!

7 हे यहोवा, यरूशलेम के गिराए जाने के दिन को एदोमियों के विरुद्ध स्मरण कर, कि वे कैसे कहते थे, “ढाओ! उसको नींव से ढा दो!”

8 हे बाबेल, तू जो जल्द उजड़नेवाली है, क्या ही धन्य वह होगा, जो तुझ से ऐसा बर्ताव करेगा जैसा तूने हम से किया है!

9 क्या ही धन्य वह होगा, जो तेरे बच्चों को पकड़कर, चट्टान पर पटक देगा!

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

What is Psalm 137 about?
It's a lament of Jewish exiles "by the rivers of Babylon," who wept remembering Zion and hung their harps on the willows rather than sing for their captors (vv.1-3).
What does verse 5 vow about Jerusalem?
V.5 vows, "If I forget thee, O Jerusalem, let my right hand forget her cunning," a promise never to forget the city even in exile.
How does the psalm end?
It ends harshly, pronouncing "happy" whoever repays Babylon "as thou hast served us," including a violent line against "her little ones" (v.9), reflecting the raw anguish of the exiles.