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भजन संहिता अध्याय 111 (IRVHIN)

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भजन संहिता अध्याय 111 (IRVHIN)
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1 यहोवा की स्तुति करो। मैं सीधे लोगों की गोष्ठी में और मण्डली में भी सम्पूर्ण मन से यहोवा का धन्यवाद करूँगा।

2 यहोवा के काम बड़े हैं, जितने उनसे प्रसन्न रहते हैं, वे उन पर ध्यान लगाते हैं।

3 उसके काम वैभवशाली और ऐश्वर्यमय होते हैं, और उसका धर्म सदा तक बना रहेगा।

4 उसने अपने आश्चर्यकर्मों का स्मरण कराया है; यहोवा अनुग्रहकारी और दयावन्त है।

5 उसने अपने डरवैयों को आहार दिया है; वह अपनी वाचा को सदा तक स्मरण रखेगा।

6 उसने अपनी प्रजा को जाति-जाति का भाग देने के लिये, अपने कामों का प्रताप दिखाया है।

7 सच्चाई और न्याय उसके हाथों के काम हैं; उसके सब उपदेश विश्वासयोग्य हैं,

8 वे सदा सर्वदा अटल रहेंगे, वे सच्चाई और सिधाई से किए हुए हैं।

9 उसने अपनी प्रजा का उद्धार किया है; उसने अपनी वाचा को सदा के लिये ठहराया है। उसका नाम पवित्र और भययोग्य है।

10 बुद्धि का मूल यहोवा का भय है; जितने उसकी आज्ञाओं को मानते हैं, उनकी समझ अच्छी होती है। उसकी स्तुति सदा बनी रहेगी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

What is the main theme of Psalm 111?
It's a praise psalm celebrating the greatness of God's works, his covenant faithfulness, and his provision for his people (vv.2-9).
What does verse 10 mean by "the fear of the LORD is the beginning of wisdom"?
V.10 states that reverence for God is the starting point of wisdom, adding that "a good understanding have all they that do his commandments." A near-identical line opens Proverbs 1:7.
What specific works of God does the psalm mention?
It highlights God giving "meat unto them that fear him" (v.5), remembering his covenant, and sending "redemption unto his people" (v.9).