वासुदेव ले चले कान्हा को, यमुना पार गोकुल की ओर।
सर्प ने छाया कर रक्षा की, चली अद्भुत रात की डोर॥
कंस के पहरेदार सो गए सारे,
खुल गए कारागार के द्वारे।
वासुदेव ले चले कान्हा को, यमुना पार गोकुल की ओर॥
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वासुदेव ले चले कान्हा को, यमुना पार गोकुल की ओर।
सर्प ने छाया कर रक्षा की, चली अद्भुत रात की डोर॥
कंस के पहरेदार सो गए सारे,
खुल गए कारागार के द्वारे।
वासुदेव ले चले कान्हा को, यमुना पार गोकुल की ओर॥
