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भजन संहिता अध्याय 95 (IRVHIN)

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भजन संहिता अध्याय 95 (IRVHIN)
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1 आओ हम यहोवा के लिये ऊँचे स्वर से गाएँ, अपने उद्धार की चट्टान का जयजयकार करें!

2 हम धन्यवाद करते हुए उसके सम्मुख आएँ, और भजन गाते हुए उसका जयजयकार करें।

3 क्योंकि यहोवा महान परमेश्वर है, और सब देवताओं के ऊपर महान राजा है।

4 पृथ्वी के गहरे स्थान उसी के हाथ में हैं; और पहाड़ों की चोटियाँ भी उसी की हैं।

5 समुद्र उसका है, और उसी ने उसको बनाया, और स्थल भी उसी के हाथ का रचा है।

6 आओ हम झुककर दण्डवत् करें, और अपने कर्ता यहोवा के सामने घुटने टेकें!

7 क्योंकि वही हमारा परमेश्वर है, और हम उसकी चराई की प्रजा, और उसके हाथ की भेड़ें हैं। भला होता, कि आज तुम उसकी बात सुनते!

8 अपना-अपना हृदय ऐसा कठोर मत करो, जैसा मरीबा में, व मस्सा के दिन जंगल में हुआ था,

9 जब तुम्हारे पुरखाओं ने मुझे परखा, उन्होंने मुझ को जाँचा और मेरे काम को भी देखा।

10 चालीस वर्ष तक मैं उस पीढ़ी के लोगों से रूठा रहा, और मैंने कहा, “ये तो भरमानेवाले मन के हैं, और इन्होंने मेरे मार्गों को नहीं पहचाना।”

11 इस कारण मैंने क्रोध में आकर शपथ खाई कि ये मेरे विश्रामस्थान में कभी प्रवेश न करने पाएँगे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

What is Psalm 95 about?
It opens as a call to worship - "O come, let us sing unto the LORD... let us kneel before the LORD our maker" (vv.1,6) - then shifts to a warning not to harden one's heart as at the wilderness rebellion.
What does Psalm 95:7-8 warn?
"To day if ye will hear his voice, harden not your heart, as in the provocation, and as in the day of temptation in the wilderness" - a reference to Israel testing God at Meribah.
What consequence does Psalm 95 describe for that generation?
Verse 11 says God swore in his wrath that generation "should not enter into my rest," after being grieved with them for forty years (v.10).