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भजन संहिता अध्याय 85 (IRVHIN)

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भजन संहिता अध्याय 85 (IRVHIN)
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1 हे यहोवा, तू अपने देश पर प्रसन्न हुआ, याकूब को बँधुवाई से लौटा ले आया है।

2 तूने अपनी प्रजा के अधर्म को क्षमा किया है; और उसके सब पापों को ढाँप दिया है। (सेला)

3 तूने अपने रोष को शान्त किया है; और अपने भड़के हुए कोप को दूर किया है।

4 हे हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर, हमको पुनः स्थापित कर, और अपना क्रोध हम पर से दूर कर!

5 क्या तू हम पर सदा कोपित रहेगा? क्या तू पीढ़ी से पीढ़ी तक कोप करता रहेगा?

6 क्या तू हमको फिर न जिलाएगा, कि तेरी प्रजा तुझ में आनन्द करे?

7 हे यहोवा अपनी करुणा हमें दिखा, और तू हमारा उद्धार कर।

8 मैं कान लगाए रहूँगा कि परमेश्वर यहोवा क्या कहता है, वह तो अपनी प्रजा से जो उसके भक्त है, शान्ति की बातें कहेगा; परन्तु वे फिरके मूर्खता न करने लगें।

9 निश्चय उसके डरवैयों के उद्धार का समय निकट है, तब हमारे देश में महिमा का निवास होगा।

10 करुणा और सच्चाई आपस में मिल गई हैं; धर्म और मेल ने आपस में चुम्बन किया हैं।

11 पृथ्वी में से सच्चाई उगती और स्वर्ग से धर्म झुकता है।

12 हाँ, यहोवा उत्तम वस्तुएँ देगा, और हमारी भूमि अपनी उपज देगी।

13 धर्म उसके आगे-आगे चलेगा, और उसके पाँवों के चिन्हों को हमारे लिये मार्ग बनाएगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

What is Psalm 85 about?
It thanks God for restoring the land and forgiving the people's iniquity (vv.1-3), then prays for God to revive them again and show his mercy.
What does 'mercy and truth are met together' mean in Psalm 85:10?
It pictures God's mercy and truth, and righteousness and peace, as personified qualities that meet and "kissed each other" - a poetic image of reconciliation between God's justice and his compassion.
How does Psalm 85 end?
It closes with righteousness going before God, setting the people "in the way of his steps" (v.13), following the request in verse 7 that God grant his salvation.