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भजन संहिता अध्याय 63 (IRVHIN)

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भजन संहिता अध्याय 63 (IRVHIN)
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1 हे परमेश्वर, तू मेरा परमेश्वर है, मैं तुझे यत्न से ढूँढ़ूगा; सूखी और निर्जल ऊसर भूमि पर, मेरा मन तेरा प्यासा है, मेरा शरीर तेरा अति अभिलाषी है।

2 इस प्रकार से मैंने पवित्रस्थान में तुझ पर दृष्टि की, कि तेरी सामर्थ्य और महिमा को देखूँ।

3 क्योंकि तेरी करुणा जीवन से भी उत्तम है, मैं तेरी प्रशंसा करूँगा।

4 इसी प्रकार मैं जीवन भर तुझे धन्य कहता रहूँगा; और तेरा नाम लेकर अपने हाथ उठाऊँगा।

5 मेरा जीव मानो चर्बी और चिकने भोजन से तृप्त होगा, और मैं जयजयकार करके तेरी स्तुति करूँगा।

6 जब मैं बिछौने पर पड़ा तेरा स्मरण करूँगा, तब रात के एक-एक पहर में तुझ पर ध्यान करूँगा;

7 क्योंकि तू मेरा सहायक बना है, इसलिए मैं तेरे पंखों की छाया में जयजयकार करूँगा।

8 मेरा मन तेरे पीछे-पीछे लगा चलता है; और मुझे तो तू अपने दाहिने हाथ से थाम रखता है।

9 परन्तु जो मेरे प्राण के खोजी हैं, वे पृथ्वी के नीचे स्थानों में जा पड़ेंगे;

10 वे तलवार से मारे जाएँगे, और गीदड़ों का आहार हो जाएँगे।

11 परन्तु राजा परमेश्वर के कारण आनन्दित होगा; जो कोई परमेश्वर की शपथ खाए, वह बड़ाई करने पाएगा; परन्तु झूठ बोलनेवालों का मुँह बन्द किया जाएगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

What is Psalm 63 about?
It is David expressing intense longing for God while in "a dry and thirsty land, where no water is" (Psalms 63:1), recalling God's power and glory seen in the sanctuary and vowing to praise and bless him continually.
What does Psalm 63 say happens to David's enemies?
Verses 9-11 say those seeking to destroy his soul will go into the lower parts of the earth, fall by the sword, and become "a portion for foxes," while the king will rejoice in God.
What does 'my soul thirsteth for thee' mean in Psalm 63?
It's David comparing his craving for God's presence to the physical thirst of someone stranded in a dry, waterless land - he says his flesh as well as his soul longs for God (v.1).