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भजन संहिता अध्याय 36 (IRVHIN)

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भजन संहिता अध्याय 36 (IRVHIN)
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1 दुष्ट जन का अपराध उसके हृदय के भीतर कहता है; परमेश्वर का भय उसकी दृष्टि में नहीं है।

2 वह अपने अधर्म के प्रगट होने और घृणित ठहरने के विषय अपने मन में चिकनी चुपड़ी बातें विचारता है।

3 उसकी बातें अनर्थ और छल की हैं; उसने बुद्धि और भलाई के काम करने से हाथ उठाया है।

4 वह अपने बिछौने पर पड़े-पड़े अनर्थ की कल्पना करता है; वह अपने कुमार्ग पर दृढ़ता से बना रहता है; बुराई से वह हाथ नहीं उठाता।

5 हे यहोवा, तेरी करुणा स्वर्ग में है, तेरी सच्चाई आकाशमण्डल तक पहुँची है।

6 तेरा धर्म ऊँचे पर्वतों के समान है, तेरा न्याय अथाह सागर के समान हैं; हे यहोवा, तू मनुष्य और पशु दोनों की रक्षा करता है।

7 हे परमेश्वर, तेरी करुणा कैसी अनमोल है! मनुष्य तेरे पंखो के तले शरण लेते हैं।

8 वे तेरे भवन के भोजन की बहुतायत से तृप्त होंगे, और तू अपनी सुख की नदी में से उन्हें पिलाएगा।

9 क्योंकि जीवन का सोता तेरे ही पास है; तेरे प्रकाश के द्वारा हम प्रकाश पाएँगे।

10 अपने जाननेवालों पर करुणा करता रह, और अपने धर्म के काम सीधे मनवालों में करता रह!

11 अहंकारी मुझ पर लात उठाने न पाए, और न दुष्ट अपने हाथ के बल से मुझे भगाने पाए।

12 वहाँ अनर्थकारी गिर पड़े हैं; वे ढकेल दिए गए, और फिर उठ न सकेंगे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

What does Psalm 36 contrast?
Psalm 36 contrasts the wickedness of those with 'no fear of God before his eyes' (v.1) with the vastness of God's mercy and faithfulness, which 'reacheth unto the clouds' (v.5), before asking God to protect from the proud and wicked (vv.11-12).
What does verse 9 mean by 'in thy light shall we see light'?
It calls God the source of both life and understanding -- 'For with thee is the fountain of life' -- language later echoed in Jesus's claim to be 'the light of the world' in John 8:12.
How does the psalm describe the wicked person's mindset?
Verse 2 says he 'flattereth himself in his own eyes, until his iniquity be found to be hateful,' describing self-deception rather than open defiance.