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भजन संहिता अध्याय 26 (IRVHIN)

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भजन संहिता अध्याय 26 (IRVHIN)
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1 हे यहोवा, मेरा न्याय कर, क्योंकि मैं खराई से चलता रहा हूँ, और मेरा भरोसा यहोवा पर अटल बना है।

2 हे यहोवा, मुझ को जाँच और परख; मेरे मन और हृदय को परख।

3 क्योंकि तेरी करुणा तो मेरी आँखों के सामने है, और मैं तेरे सत्य मार्ग पर चलता रहा हूँ।

4 मैं निकम्मी चाल चलनेवालों के संग नहीं बैठा, और न मैं कपटियों के साथ कहीं जाऊँगा;

5 मैं कुकर्मियों की संगति से घृणा रखता हूँ, और दुष्टों के संग न बैठूँगा।

6 मैं अपने हाथों को निर्दोषता के जल से धोऊँगा, तब हे यहोवा मैं तेरी वेदी की प्रदक्षिणा करूँगा,

7 ताकि तेरा धन्यवाद ऊँचे शब्द से करूँ, और तेरे सब आश्चर्यकर्मों का वर्णन करूँ।

8 हे यहोवा, मैं तेरे धाम से तेरी महिमा के निवास-स्थान से प्रीति रखता हूँ।

9 मेरे प्राण को पापियों के साथ, और मेरे जीवन को हत्यारों के साथ न मिला।

10 वे तो ओछापन करने में लगे रहते हैं, और उनका दाहिना हाथ घूस से भरा रहता है।

11 परन्तु मैं तो खराई से चलता रहूँगा। तू मुझे छुड़ा ले, और मुझ पर दया कर।

12 मेरे पाँव चौरस स्थान में स्थिर है; सभाओं में मैं यहोवा को धन्य कहा करूँगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

What does Psalm 26 deal with?
Psalm 26 is David's appeal for God to examine his integrity, describing his refusal to associate with 'vain persons' or 'dissemblers' (v.4) and his love for worship at God's house (v.8).
What does 'Examine me, O LORD, and prove me' mean in verse 2?
David invites God to test his inner life -- 'try my reins and my heart' -- inviting the same kind of self-examination later voiced in Psalms 139:23-24.
How does the psalm end?
Verse 12 ends on stability: 'My foot standeth in an even place: in the congregations will I bless the LORD.'