1 उस दिन तू कहेगा, “हे यहोवा, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ, क्योंकि यद्यपि तू मुझ पर क्रोधित हुआ था, परन्तु अब तेरा क्रोध शान्त हुआ, और तूने मुझे शान्ति दी है।”
2 देखो “परमेश्वर मेरा उद्धार है, मैं भरोसा रखूँगा और न थरथराऊँगा; क्योंकि प्रभु यहोवा मेरा बल और मेरे भजन का विषय है, और वह मेरा उद्धारकर्ता हो गया है।”
3 तुम आनन्दपूर्वक उद्धार के सोतों से जल भरोगे।
4 और उस दिन तुम कहोगे, “यहोवा की स्तुति करो, उससे प्रार्थना करो; सब जातियों में उसके बड़े कामों का प्रचार करो, और कहो कि उसका नाम महान है।
5 “ यहोवा का भजन गाओ, क्योंकि उसने प्रतापमय काम किए हैं, इसे सारी पृथ्वी पर प्रगट करो।
6 हे सिय्योन में बसनेवाली तू जयजयकार कर और ऊँचे स्वर से गा, क्योंकि इस्राएल का पवित्र तुझ में महान है।”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
What's this short chapter, Isaiah 12, about?
What does 'the LORD JEHOVAH is my strength and my song' mean in verse 2?
What does 'draw water out of the wells of salvation' mean in verse 3?
The line the Lord Jehovah is my strength and my song closely echoes Moses's song after the Red Sea in Exodus 15:2, and the drawing of water from the wells of salvation gives way to the darker burden of Isaiah 13.
